वर्ष 2010 में सरकार मज़बूत विकास दर को एक तमग़े की तरह प्रस्तुत करती रही लेकिन महंगाई को लेकर उस पर लगातार दवाब बनता रहा.कुल मिलाकर मुद्रास्फीति की दर तो नीचे आई लेकिन खाद्य पदार्थों की क़ीमतों पर असाधारण दवाब बरक़रार है.वर्ष के अंत तक मुद्रास्फीति की दर आठ फ़ीसदी से नीचे आ गई है.अब प्रधानमंत्री और रिज़र्व बैंक दोनों को ही उम्मीद है कि मार्च में जब मौजूदा वित्त वर्ष समाप्त होगा तो ये दर साढ़े पांच प्रतिशत तक पहुंच जाएगी.
उधर इस वर्ष से मुद्रास्फीति मापने के तरीके में भी परिवर्तन किया गया है.इस वर्ष सितंबर से मुद्रास्फीति की दर मापने के लिए 2004-05 को आधार वर्ष बनाया गया है. पहले 1993-94 को आधार वर्ष बनाकर ये दर मापी जाती थी.साथ ही कुछ नई वस्तुओं को भी महंगाई दर परखने की सूची में शामिल किया गया है. नई सूची में कुल 241 नई वस्तुएं शामिल की गई हैं.नई वस्तुओं में आईसक्रीम, खाने के लिए तैयार (पैकेट बंद) भोजन, माइक्रोवेव ओवन, फ़्रिज, कंपयूटर, सोना, चांदी और डिश एंटिना आदि शामिल हैं.
लेकिन वर्ष का अंत होने से ठीक पहले प्याज़ के दाम एक बार फिर आसमान छू रहे हैं. भारतीय रसोई के लिए प्याज़ की महत्ता को देखते हुए ये एक संवदेनशील मुद्दा है.भारत के प्रमुख प्याज़ उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण फ़सल के उत्पादन में कमी आई है.ये बताने की ज़रुरत नहीं है कि राजनीतिक तौर पर प्याज़ कितनी बार नेताओं की आंखों में आंसू ला चुका है.
विकास दर के इंजन का ईंधन औद्योगिक उत्पादन ने प्रदान किया जिसमें सुधार के साफ़ संकेत दिखे.औद्योगिक उत्पादन की दर सितंबर में जब 4.4 प्रतिशत तक गिर गई तो इस बात की चिंता की जाने लगी कि क्या भारत अपनी विकास दर के साढ़े आठ और नौ प्रतिशत के बीच रखने के लक्ष्य से कहीं चूक तो नहीं जाएगा?लेकिन हाल ही में अक्तूबर माह के लिए आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों ने आस बंधाई है.अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन की दर 10.8 प्रतिशत रही जो मज़बूत होती अर्थव्यवस्था की ओर इशारा करती है.अक्तूबर में सामने आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अर्थशास्त्रियों के अनुमान से कहीं बेहतर हैं. इन आंकड़ें ने फ़िलहाल आर्थिक विकास की धीमी गति के प्रति आंशकाओं को दरकिनार कर दिया है.विशेषकर कारखानों और खनन क्षेत्र में इस वर्ष अक्तूबर में 10.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ये 2010 के सितंबर के 4.4 प्रतिशत के दुगने से अधिक है.पूरे औद्योगिक उत्पादन में मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्र का हिस्सा 80 प्रतिशत होता है. मैनुफ़ैक्चरिंग में कारें, दो पहिया वाहन, टीवी सेट आदि आते हैं. इस क्षेत्र में अक्तूबर माह में 11.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.जानकार मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में आया ये ताज़ा जोश भारत में निवेश और उपभोक्ता लक्षण के लिए बढ़िया संकेत है.वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी औद्योगिक उत्पादन में आई तेज़ी से उत्साहित हैं.उन्होंने उम्मीद जताई है कि ये ट्रेंड आने वाले महीनों में बरक़रार रहेगा.
भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूत स्तंभ कृषि के उत्पादन में वर्ष 2010 में सुधार देखा गया है.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब भी भारत की क़रीब 55 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र में काम कर रही है.नवंबर के अतं में जारी किए गए केंद्रीय सांख्यिकी संस्था के आंकड़ें बताते हैं मौजूदा वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र के उप्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है.वित्तीय वर्ष 2010-11 के पहले छह महीनों में कृषि क्षेत्र में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई जो पिछले साल की तुलना में काफ़ी बेहतर है.सितंबर में आए सरकार के प्रथम अग्रिम अनुमान के अनुसार ख़रीफ़ में 11 करोड़ 40 लाख टन से अधिक अनाज का उत्पादन हुआ. गत वर्ष यानी 2009-10 में ये उत्पादन 10 करोड़ 30 लाख के क़रीब था.इस तरह ये क़रीब 10 प्रतिशत की वृद्धि है.कृषि उत्पादन में आए उछाल के लिए अच्छे मानसून को बड़ा कारण माना गया.लेकिन खेती-बाड़ी और किसानों को लेकर अब भी चिंताएं बनी हुईं हैं.इस वर्ष अनाज के भंडारण में बरती जा रही लापरवाहियां भी सामने आईं. कुछ उत्तरी भारतीय राज्यों में खुले में रखा कई टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ गया.इन घटनाओं के बाद भंडारण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए आवाज़ें उठीं.उधर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी कर्ज़ में डूबे किसान अपनी जान ले रहे हैं.
अमरीका ने अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नवंबर 2010 में एक ‘महापैकेज’ का ऐलान किया.देश के केंद्रीय बैंक ‘फ़ेडरल रिज़र्व’ ने घोषणा की है कि जून 2011 तक कमज़ोर अमरीकी अर्थव्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के लिए 600 बिलियन डॉलर झोंके जाएंगे.इस तरह से अमरीकी अर्थव्यवस्था में गति लाने के लिए हर महीने 75 बिलियन डॉलर की सहायता दी जाएगी.अमरीकी अर्थव्यवस्था इस वर्ष जून से सितंबर के बीच सिर्फ़ दो प्रतिशत की दर से बढ़ी.इतनी धीमी विकास दर बढ़ी हुई बेरोज़गारी को कम करने के लिए नाकाफ़ी है.कुछ जानकारों का मानना है कि ये ‘महापैकेज’ अमरीकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का अंतिम अवसर है.कुछ देशों ने अमरीका के इस क़दम की ये कहते हुए आलोचना की है कि इससे अमरीकी व्यवसाय को ‘अनुचित लाभ’ मिलेगा.सिओल में हुए विश्व की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सम्मेलन में भी इस पैकेज पर सवाल उठाए गए थे.मौजूदा आर्थिक मंदी से निपटने के लिए अमरीकी केंद्रीय बैंक का ये दूसरा पैकेज है. पहले दौर में इससे भी कहीं ज़्यादा यानी 1.75 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था में डाले गए थे.दुनिया भर में केंद्रीय बैंक अपने देशों की अर्थव्यवस्था की सहायता करने के लिए ऐसे क़दम उठाते हैं जिन्हें 'क्वांटीटेटिव ईज़िंग' कहा जाता है.केंद्रीय बैंक सरकारी और कई बार कॉरपोरेट बॉन्ड ख़रीदते हैं ताकि ऋण सस्ता हो सके. केंद्रीय बैंक रिटेल बैंकों के बॉन्ड भी ख़रीद सकते हैं जिससे इन बैंकों के पास कर्ज़ देने के लिए धन उपलब्ध हो जाता है.
ग्रीस में विरोध प्रदर्शन
वर्ष 2010 में प्रमुख चुनौती पेश आई यूरोप से. शुरूआत में ग्रीस घाटे के बोझ ऐसा डूबा कि एकबारगी तो लगा कि देश कहीं आर्थिक रूप से धराशाई ना हो जाए.ग्रीस में तीन साल से चल रही आर्थिक मंदी ने एक भयावह शक्ल अख़्तियार कर ली.लेकिन यूरोपीय संघ और आर्थिक मुद्रा कोष ने अपनी जेबें ढीली की और मोटी रकम सहायता की तौर पर ग्रीस को दी.ग्रीस की अर्थव्यवस्था के लिए 110 बिलियन अमरीकी डॉलर का एक अंतरराष्ट्रीय राहत कोष बनाया गया है.लेकिन ये मदद सरकारी ख़र्चों में भारी कटौती जैसी कई कड़ी शर्तों के साथ आई.और जब सरकार ने वेतन भत्तों में ख़र्चों में कटौती का ऐलान किया तो एथेंस की सड़कों पर घमासान मच गया. ग्रीस की ट्रेड यूनियनों और आम लोगों ने इन कटौतियों का जमकर विरोध किया और हिंसा भी हुई.इसी बीच ये भी भय व्याप्त हो गया कि ग्रीस का ऋण संकट कहीं अन्य यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को अपनी चपेट में ना ले ले.जो कुछ ग्रीस से शुरू हुआ उसकी चिंता की लकीरें सारे यूरोपीय संघ में साफ़ देखी जा सकती हैं.
उधर इस वर्ष से मुद्रास्फीति मापने के तरीके में भी परिवर्तन किया गया है.इस वर्ष सितंबर से मुद्रास्फीति की दर मापने के लिए 2004-05 को आधार वर्ष बनाया गया है. पहले 1993-94 को आधार वर्ष बनाकर ये दर मापी जाती थी.साथ ही कुछ नई वस्तुओं को भी महंगाई दर परखने की सूची में शामिल किया गया है. नई सूची में कुल 241 नई वस्तुएं शामिल की गई हैं.नई वस्तुओं में आईसक्रीम, खाने के लिए तैयार (पैकेट बंद) भोजन, माइक्रोवेव ओवन, फ़्रिज, कंपयूटर, सोना, चांदी और डिश एंटिना आदि शामिल हैं.
लेकिन वर्ष का अंत होने से ठीक पहले प्याज़ के दाम एक बार फिर आसमान छू रहे हैं. भारतीय रसोई के लिए प्याज़ की महत्ता को देखते हुए ये एक संवदेनशील मुद्दा है.भारत के प्रमुख प्याज़ उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण फ़सल के उत्पादन में कमी आई है.ये बताने की ज़रुरत नहीं है कि राजनीतिक तौर पर प्याज़ कितनी बार नेताओं की आंखों में आंसू ला चुका है.
विकास दर के इंजन का ईंधन औद्योगिक उत्पादन ने प्रदान किया जिसमें सुधार के साफ़ संकेत दिखे.औद्योगिक उत्पादन की दर सितंबर में जब 4.4 प्रतिशत तक गिर गई तो इस बात की चिंता की जाने लगी कि क्या भारत अपनी विकास दर के साढ़े आठ और नौ प्रतिशत के बीच रखने के लक्ष्य से कहीं चूक तो नहीं जाएगा?लेकिन हाल ही में अक्तूबर माह के लिए आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों ने आस बंधाई है.अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन की दर 10.8 प्रतिशत रही जो मज़बूत होती अर्थव्यवस्था की ओर इशारा करती है.अक्तूबर में सामने आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अर्थशास्त्रियों के अनुमान से कहीं बेहतर हैं. इन आंकड़ें ने फ़िलहाल आर्थिक विकास की धीमी गति के प्रति आंशकाओं को दरकिनार कर दिया है.विशेषकर कारखानों और खनन क्षेत्र में इस वर्ष अक्तूबर में 10.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ये 2010 के सितंबर के 4.4 प्रतिशत के दुगने से अधिक है.पूरे औद्योगिक उत्पादन में मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्र का हिस्सा 80 प्रतिशत होता है. मैनुफ़ैक्चरिंग में कारें, दो पहिया वाहन, टीवी सेट आदि आते हैं. इस क्षेत्र में अक्तूबर माह में 11.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.जानकार मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में आया ये ताज़ा जोश भारत में निवेश और उपभोक्ता लक्षण के लिए बढ़िया संकेत है.वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी औद्योगिक उत्पादन में आई तेज़ी से उत्साहित हैं.उन्होंने उम्मीद जताई है कि ये ट्रेंड आने वाले महीनों में बरक़रार रहेगा.
भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूत स्तंभ कृषि के उत्पादन में वर्ष 2010 में सुधार देखा गया है.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब भी भारत की क़रीब 55 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र में काम कर रही है.नवंबर के अतं में जारी किए गए केंद्रीय सांख्यिकी संस्था के आंकड़ें बताते हैं मौजूदा वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र के उप्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है.वित्तीय वर्ष 2010-11 के पहले छह महीनों में कृषि क्षेत्र में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई जो पिछले साल की तुलना में काफ़ी बेहतर है.सितंबर में आए सरकार के प्रथम अग्रिम अनुमान के अनुसार ख़रीफ़ में 11 करोड़ 40 लाख टन से अधिक अनाज का उत्पादन हुआ. गत वर्ष यानी 2009-10 में ये उत्पादन 10 करोड़ 30 लाख के क़रीब था.इस तरह ये क़रीब 10 प्रतिशत की वृद्धि है.कृषि उत्पादन में आए उछाल के लिए अच्छे मानसून को बड़ा कारण माना गया.लेकिन खेती-बाड़ी और किसानों को लेकर अब भी चिंताएं बनी हुईं हैं.इस वर्ष अनाज के भंडारण में बरती जा रही लापरवाहियां भी सामने आईं. कुछ उत्तरी भारतीय राज्यों में खुले में रखा कई टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ गया.इन घटनाओं के बाद भंडारण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए आवाज़ें उठीं.उधर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी कर्ज़ में डूबे किसान अपनी जान ले रहे हैं.
अमरीका ने अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नवंबर 2010 में एक ‘महापैकेज’ का ऐलान किया.देश के केंद्रीय बैंक ‘फ़ेडरल रिज़र्व’ ने घोषणा की है कि जून 2011 तक कमज़ोर अमरीकी अर्थव्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के लिए 600 बिलियन डॉलर झोंके जाएंगे.इस तरह से अमरीकी अर्थव्यवस्था में गति लाने के लिए हर महीने 75 बिलियन डॉलर की सहायता दी जाएगी.अमरीकी अर्थव्यवस्था इस वर्ष जून से सितंबर के बीच सिर्फ़ दो प्रतिशत की दर से बढ़ी.इतनी धीमी विकास दर बढ़ी हुई बेरोज़गारी को कम करने के लिए नाकाफ़ी है.कुछ जानकारों का मानना है कि ये ‘महापैकेज’ अमरीकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का अंतिम अवसर है.कुछ देशों ने अमरीका के इस क़दम की ये कहते हुए आलोचना की है कि इससे अमरीकी व्यवसाय को ‘अनुचित लाभ’ मिलेगा.सिओल में हुए विश्व की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सम्मेलन में भी इस पैकेज पर सवाल उठाए गए थे.मौजूदा आर्थिक मंदी से निपटने के लिए अमरीकी केंद्रीय बैंक का ये दूसरा पैकेज है. पहले दौर में इससे भी कहीं ज़्यादा यानी 1.75 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था में डाले गए थे.दुनिया भर में केंद्रीय बैंक अपने देशों की अर्थव्यवस्था की सहायता करने के लिए ऐसे क़दम उठाते हैं जिन्हें 'क्वांटीटेटिव ईज़िंग' कहा जाता है.केंद्रीय बैंक सरकारी और कई बार कॉरपोरेट बॉन्ड ख़रीदते हैं ताकि ऋण सस्ता हो सके. केंद्रीय बैंक रिटेल बैंकों के बॉन्ड भी ख़रीद सकते हैं जिससे इन बैंकों के पास कर्ज़ देने के लिए धन उपलब्ध हो जाता है.
ग्रीस में विरोध प्रदर्शन
वर्ष 2010 में प्रमुख चुनौती पेश आई यूरोप से. शुरूआत में ग्रीस घाटे के बोझ ऐसा डूबा कि एकबारगी तो लगा कि देश कहीं आर्थिक रूप से धराशाई ना हो जाए.ग्रीस में तीन साल से चल रही आर्थिक मंदी ने एक भयावह शक्ल अख़्तियार कर ली.लेकिन यूरोपीय संघ और आर्थिक मुद्रा कोष ने अपनी जेबें ढीली की और मोटी रकम सहायता की तौर पर ग्रीस को दी.ग्रीस की अर्थव्यवस्था के लिए 110 बिलियन अमरीकी डॉलर का एक अंतरराष्ट्रीय राहत कोष बनाया गया है.लेकिन ये मदद सरकारी ख़र्चों में भारी कटौती जैसी कई कड़ी शर्तों के साथ आई.और जब सरकार ने वेतन भत्तों में ख़र्चों में कटौती का ऐलान किया तो एथेंस की सड़कों पर घमासान मच गया. ग्रीस की ट्रेड यूनियनों और आम लोगों ने इन कटौतियों का जमकर विरोध किया और हिंसा भी हुई.इसी बीच ये भी भय व्याप्त हो गया कि ग्रीस का ऋण संकट कहीं अन्य यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को अपनी चपेट में ना ले ले.जो कुछ ग्रीस से शुरू हुआ उसकी चिंता की लकीरें सारे यूरोपीय संघ में साफ़ देखी जा सकती हैं.
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