हिंदी फ़िल्म संगीत की दृष्टि से साल 2010 बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा. फ़िल्म संगीत के कैनवास पर पिछले कुछ सालों से स्थापित नामों का इस बार रंग फीका ही रहा. वहीं कुछ ताज़ा हस्ताक्षर उभर कर दर्ज हुए.शोर शराबे का संगीत बहुत ज़्यादा नहीं चला लेकिन वहीं कुछ आइटम गीत गली-गली में गुंजायमान रहे और बच्चों से लेकर बड़ों के लबों पर रहे.साल की शुरुआत हुई तो पिछले साल के थ्री इडियट्स और अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी के अलावा वेक-अप सिड के 'इकतारा' की गूंज शुरुआती कुछ महीनों तक बरक़रार रही. लेकिन साथ ही इस वर्ष की पहली तिमाही की फ़िल्मों ने साल को एक सुरीली शुरुआत दी. ख़ासकर विशाल भारद्वाज की इश्क़िया और शंकर-एहसान-लॉय की माइ नेम इज़ खान लोगों को ख़ासे पसंद आए.इश्क़िया के 'दिल तो बच्चा है जी' और 'इब्ने बतूता' और माई नेम इज़ खान का 'सजदा' और 'तेरे नैना' बेहद लोकप्रिय हुए.
साजिद-वाजिद की वीर का संगीत अच्छा था और राहत का गाया 'सुरीली अँखियों वाले' लोकप्रिय हुआ लेकिन फ़िल्म की असफलता की वजह से संगीत ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया.यही हाल शंकर-एहसान-लॉय की कार्तिक कॉलिंग कार्तिक का रहा जिसके कुछ गीत (जैसे- उफ़ तेरी अदा हो या तुम्हें कैसे मैं बताऊं) लोकप्रिय हुए मगर फ़िल्म की नाकामी की वजह से बहुत दूर तक नहीं जा सके.
संगीत के लिहाज़ से पहली तिमाही के दो और एलबम उल्लेखनीय हैं. कई सारे संगीतकारों (विशाल भारद्वाज, अमित त्रिवेदी, शैलेंद्र बर्वे, युवान शंकर राजा, स्वानन्द किरकिरे और ब्लाज़े) के संगीत से सजी स्ट्राइकर, जिसमें सोनू निगम का गाया 'छम छम' (शैलेंद्र बर्वे ) और विशाल भारद्वाज का गाया और रचित 'और फिर यूं हुआ' पसंद किए गए.
युवा संगीतकार स्नेहा खानविल्कर के अनूठे और प्रयोगवादी स्वर फ़िल्म एलएसडी (लव, सेक्स और धोखा) के प्रचार में महत्वपूर्ण साबित हुए और लीक से हट कर दिया गया संगीत उनके बारे में काफ़ी उम्मीद जगाता है.
दूसरी तिमाही
इस तिमाही में संगीत की बागडोर दो बड़ी फ़िल्मों के हाथ रही. राजेश रोशन की काइट्स और ए आर रहमान की रावण.रिलीज़ से पहले दोनों ही फ़िल्मों का संगीत काफ़ी चला लेकिन फ़िल्में दर्शकों को पसंद नहीं आईं जिसका असर गीतों पर भी पड़ा और लोगों ने उन्हें भुला दिया.
रावण का 'बीरां-बीरां' लोगों की ज़बान पर चढ़ा तो काइट्स का 'ज़िंदगी दो पल की' और 'दिल क्यों ये शोर करे' लोगों को पसंद आने लगे थे. लेकिन जब ये दोनों फ़िल्में फ्लॉप हो गईं तो हर म्यूज़िक चार्ट से ये गाने उतर गए.
इसी वक़्त आईं हाउसफ़ुल और बदमाश कंपनी का संगीत हिट साबित हुआ. हाउसफ़ुल के दो मसाला गीत, 'अपनी तो जैसे तैसे' और 'पप्पा जग जाएगा' ने रेडियो और टीवी पर खूब धमाल मचाया.वहीं बदमाश कंपनी का ‘अय्याशी’ भी खूब बजा. राजनीति का ‘मोरा पिया (आदेश श्रीवास्तव)’ भी थोड़ा लोकप्रिय साबित हुआ.
'उड़ान' जैसा काव्यात्मक एलबम, 'पीपली लाइव' का देहाती परिवेश में रंगा, मुद्दों की बात करता संगीत, 'तेरे बिन लादेन' का मज़ेदार थीम सॉन्ग और साथ में 'आई हेट लव स्टोरीज़' और 'अंजाना-अंजानी' (विशाल शेखर) का युवा प्रधान संगीत.
इसके अलावा रोम-कॉम में अपनी अलग छाप छोड़ने वाला एलबम 'आएशा', रेट्रो फ़ील और लोकप्रिय धुनों से रचा 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' और इन सबके बीच ज़बरदस्त उपस्थिति दर्ज कराता बेहद मक़बूल 'दबंग', ये सभी इस दौर में आए.
वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई
फ़िल्म की सफ़लता के लिए आधार स्थापित करने में दबंग के संगीत ने बहुत बड़ा योगदान दिया. संगीतकार ललित (जतिन-ललित) का 'मुन्नी बदनाम हुई' पहले प्रोमो के साथ ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया और घरों, मुहल्लों, शादियों, महफ़िलों और यहां तक कि गणेश पंडालों और दुर्गा पूजा के पंडालों में भी जम कर बजा.
इसके अलावा राहत का ‘तेरे मस्त मस्त दो नैन’, ‘चोरी किया‘ और टाइटल गीत ‘हुड़-हुड़ दबंग’ भी बहुत सुने गए. पीपली लाइव का ‘महंगाई डायन’ भी बेहद लोकप्रिय हुआ मगर इस तिमाही में सबसे प्रभावी संगीत दिया युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी ने 'उड़ान' और 'आएशा' में.उड़ान के ‘नाव’, ‘आज़ादियां’ और टाइटल गीत, आएशा के ‘शाम’, ‘गल मीठी मीठी’, और ‘बहके बहके’ सुनने वालों के दिल में जगह बनाने में कामयाब रहे.
एक और एलबम है जिसका इस तिमाही मे जिक्र उल्लेखनीय है और वो है 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई'. बाकी फ़िल्मों से थोड़ा अलग रंग लिए इस एलबम में मोहित चौहान का 'पी लूं', सत्तर के दशक में रंगे 'परदा परदा' और 'तुम जो आए' ने बढ़िया रंग जमाया.
साल की आख़िरी तिमाही की कहानी भी बहुत कुछ दूसरी तिमाही की तरह ही रही. दो बड़ी फ़िल्में 'ग़ुज़ारिश' और 'खेलें हम जी जान से' ने ‘काइट्स’ और ‘रावण’ की कहानी दोहराई.दोनों फ़िल्मों का संगीत काफ़ी अच्छा बन पड़ा था और फ़िल्म की रिलीज़ से पहले पसंद किया गया लेकिन फ़िल्मों की असफ़लता ने संगीत की सफ़लता पर भी असर डाला.
इस दौर में भी दो आइटम साँग बेहद लोकप्रिय हुए. ऐक्शन रीप्ले का 'ज़ोर का झटका' और तीसमार खाँ का 'शीला की जवानी', जिसको 'मुन्नी' के बाद साल का सबसे ज़्यादा बजने वाला गीत कहा जा सकता है.हालांकि फ़िल्म की बॉक्स ऑफ़िस रिपोर्ट आने के बाद लगता है कि शायद ये गीत 'मुन्नी' जितनी दूर नहीं जा पाएगा. ‘रोबोट’ जैसी फ़िल्म ने बहुत निराश किया वहीं ‘ब्रेक के बाद’, ‘बैंड बाजा बारात’ और ‘झूठा ही सही’ कुछ हद तक कामयाब रहे.
साल के कुछ और उल्लेखनीय गीतों में लाहौर का 'ओ रे बंदे', ब्रेक के बाद का 'धूप के मकान', मिर्च का 'कारे बदरा', दस तोला का 'जिया जलाइयो रे', लम्हा का 'मदनो', और लफ़ंगे परिंदे का 'मन लफ़ंगा' ज़िक्र के योग्य है.कुल मिलाकर फ़िल्म संगीत को अलग से पैकेज करने के बजाय निर्माताओं की रुचि फ़िल्म के प्रसार प्रचार के उपयोग के लिये ही नज़र आई.
इस बार फिर से डिजिटल संगीत का बोलबाला रहा हालांकि एक अच्छी बात ये हुई कि काफ़ी समय बाद फ़िल्म संगीत के एल पी रिकार्ड्स (झूठा ही सही) जारी करने का चलन फिर से शुरु हुआ.कुछ प्रमुख म्यूज़िक कंपनियों ने अपना संगीत डिजिटल फ़ॉर्म में इंटरनेट के ज़रिए पहली बार वैधानिक तरीके से डाउनलोड और ख़रीदने के लिये उपलब्ध कराया.
इस साल संगीतकार और गज़ब के सैक्सोफ़ोन वादक मनोहारी सिंह, युवा गायिका स्वर्णलता और विंटेज दौर की ललिता देओलकर जैसे बड़े नाम हमें हमेशा के लिये अलविदा कह गए.
इंडियन ओशन बैंड के अशीम चक्रवर्ती पिछले साल के आख़िर में इसी समय अलविदा कह गए थे. उनका ज़िक़्र इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इस साल इंडियन ओशन के संगीत के सफ़र पर बनी डॉक्यूमेंट्री, सिनेमा फ़ेस्टिवल्स और सैटेलाइट नेटवर्क के अतिरिक्त पहली बार सिनेमाघरों में नियमित शो पर दिखाई गई.
नए साल की शुरुआत से ही भारतीय संगीत प्रेमियों को उत्सुक्ता रहेगी कि क्या ए आर रहमान एक बार फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल होकर एक और बार ये पुरस्कार जीत पाएंगे.रहमान के संगीत वाली डैनी बॉयल की फ़िल्म 127 ऑवर्स का एक गीत दौड़ में शामिल है और जनवरी में ये साफ़ हो जाएगा कि सर्वश्रेष्ठ पाँच गीतों के लिए वो दौड़ में बना रहता है या नहीं. उम्मीद है कि 2011 में हिंदी फ़िल्म संगीत नए स्वर और नए रंग लेकर आएगा.
2010: सारांश
लोकप्रिय एलबम: दबंग, तीसमार ख़ां.
सर्वश्रेष्ठ एलबम : इश्क़िया, उड़ान, आएशा.
सर्वश्रेष्ठ संगीतकार : अमित त्रिवेदी
सर्वश्रेठ नवोदित स्वर : विभावरी जोशी (साइबा, फ़िल्म- ग़ुज़ारिश).
सर्वश्रेष्ठ गीत : दिल तो बच्चा है जी (गुलज़ार).
लोकप्रिय गीत : मुन्नी बदनाम हुई (दबंग), शीला की जवानी (तीसमार ख़ां), ज़ोर का झटका(ऐक्शन रीप्ले).
प्रयोगवादी संगीत : एल एस डी (लव सैक्स और धोखा)
निराशाजनक : वी आर फ़ैमिली, आशाएं, रोबोट.
2011: उम्मीदें
नो वन किल्ड जैसिका (अमित त्रिवेदी)
सात ख़ून माफ़ (विशाल भारद्वाज)
ये साली ज़िंदगी (निशात खान)
मौसम (प्रीतम)
रा.वन (इल्लैयाराजा, हैन्स ज़िम्मेर, विशाल-शेखर)
साजिद-वाजिद की वीर का संगीत अच्छा था और राहत का गाया 'सुरीली अँखियों वाले' लोकप्रिय हुआ लेकिन फ़िल्म की असफलता की वजह से संगीत ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया.यही हाल शंकर-एहसान-लॉय की कार्तिक कॉलिंग कार्तिक का रहा जिसके कुछ गीत (जैसे- उफ़ तेरी अदा हो या तुम्हें कैसे मैं बताऊं) लोकप्रिय हुए मगर फ़िल्म की नाकामी की वजह से बहुत दूर तक नहीं जा सके.
संगीत के लिहाज़ से पहली तिमाही के दो और एलबम उल्लेखनीय हैं. कई सारे संगीतकारों (विशाल भारद्वाज, अमित त्रिवेदी, शैलेंद्र बर्वे, युवान शंकर राजा, स्वानन्द किरकिरे और ब्लाज़े) के संगीत से सजी स्ट्राइकर, जिसमें सोनू निगम का गाया 'छम छम' (शैलेंद्र बर्वे ) और विशाल भारद्वाज का गाया और रचित 'और फिर यूं हुआ' पसंद किए गए.
युवा संगीतकार स्नेहा खानविल्कर के अनूठे और प्रयोगवादी स्वर फ़िल्म एलएसडी (लव, सेक्स और धोखा) के प्रचार में महत्वपूर्ण साबित हुए और लीक से हट कर दिया गया संगीत उनके बारे में काफ़ी उम्मीद जगाता है.
दूसरी तिमाही
इस तिमाही में संगीत की बागडोर दो बड़ी फ़िल्मों के हाथ रही. राजेश रोशन की काइट्स और ए आर रहमान की रावण.रिलीज़ से पहले दोनों ही फ़िल्मों का संगीत काफ़ी चला लेकिन फ़िल्में दर्शकों को पसंद नहीं आईं जिसका असर गीतों पर भी पड़ा और लोगों ने उन्हें भुला दिया.
रावण का 'बीरां-बीरां' लोगों की ज़बान पर चढ़ा तो काइट्स का 'ज़िंदगी दो पल की' और 'दिल क्यों ये शोर करे' लोगों को पसंद आने लगे थे. लेकिन जब ये दोनों फ़िल्में फ्लॉप हो गईं तो हर म्यूज़िक चार्ट से ये गाने उतर गए.
इसी वक़्त आईं हाउसफ़ुल और बदमाश कंपनी का संगीत हिट साबित हुआ. हाउसफ़ुल के दो मसाला गीत, 'अपनी तो जैसे तैसे' और 'पप्पा जग जाएगा' ने रेडियो और टीवी पर खूब धमाल मचाया.वहीं बदमाश कंपनी का ‘अय्याशी’ भी खूब बजा. राजनीति का ‘मोरा पिया (आदेश श्रीवास्तव)’ भी थोड़ा लोकप्रिय साबित हुआ.
'उड़ान' जैसा काव्यात्मक एलबम, 'पीपली लाइव' का देहाती परिवेश में रंगा, मुद्दों की बात करता संगीत, 'तेरे बिन लादेन' का मज़ेदार थीम सॉन्ग और साथ में 'आई हेट लव स्टोरीज़' और 'अंजाना-अंजानी' (विशाल शेखर) का युवा प्रधान संगीत.
इसके अलावा रोम-कॉम में अपनी अलग छाप छोड़ने वाला एलबम 'आएशा', रेट्रो फ़ील और लोकप्रिय धुनों से रचा 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' और इन सबके बीच ज़बरदस्त उपस्थिति दर्ज कराता बेहद मक़बूल 'दबंग', ये सभी इस दौर में आए.
वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई
फ़िल्म की सफ़लता के लिए आधार स्थापित करने में दबंग के संगीत ने बहुत बड़ा योगदान दिया. संगीतकार ललित (जतिन-ललित) का 'मुन्नी बदनाम हुई' पहले प्रोमो के साथ ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया और घरों, मुहल्लों, शादियों, महफ़िलों और यहां तक कि गणेश पंडालों और दुर्गा पूजा के पंडालों में भी जम कर बजा.
इसके अलावा राहत का ‘तेरे मस्त मस्त दो नैन’, ‘चोरी किया‘ और टाइटल गीत ‘हुड़-हुड़ दबंग’ भी बहुत सुने गए. पीपली लाइव का ‘महंगाई डायन’ भी बेहद लोकप्रिय हुआ मगर इस तिमाही में सबसे प्रभावी संगीत दिया युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी ने 'उड़ान' और 'आएशा' में.उड़ान के ‘नाव’, ‘आज़ादियां’ और टाइटल गीत, आएशा के ‘शाम’, ‘गल मीठी मीठी’, और ‘बहके बहके’ सुनने वालों के दिल में जगह बनाने में कामयाब रहे.
एक और एलबम है जिसका इस तिमाही मे जिक्र उल्लेखनीय है और वो है 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई'. बाकी फ़िल्मों से थोड़ा अलग रंग लिए इस एलबम में मोहित चौहान का 'पी लूं', सत्तर के दशक में रंगे 'परदा परदा' और 'तुम जो आए' ने बढ़िया रंग जमाया.
साल की आख़िरी तिमाही की कहानी भी बहुत कुछ दूसरी तिमाही की तरह ही रही. दो बड़ी फ़िल्में 'ग़ुज़ारिश' और 'खेलें हम जी जान से' ने ‘काइट्स’ और ‘रावण’ की कहानी दोहराई.दोनों फ़िल्मों का संगीत काफ़ी अच्छा बन पड़ा था और फ़िल्म की रिलीज़ से पहले पसंद किया गया लेकिन फ़िल्मों की असफ़लता ने संगीत की सफ़लता पर भी असर डाला.
इस दौर में भी दो आइटम साँग बेहद लोकप्रिय हुए. ऐक्शन रीप्ले का 'ज़ोर का झटका' और तीसमार खाँ का 'शीला की जवानी', जिसको 'मुन्नी' के बाद साल का सबसे ज़्यादा बजने वाला गीत कहा जा सकता है.हालांकि फ़िल्म की बॉक्स ऑफ़िस रिपोर्ट आने के बाद लगता है कि शायद ये गीत 'मुन्नी' जितनी दूर नहीं जा पाएगा. ‘रोबोट’ जैसी फ़िल्म ने बहुत निराश किया वहीं ‘ब्रेक के बाद’, ‘बैंड बाजा बारात’ और ‘झूठा ही सही’ कुछ हद तक कामयाब रहे.
साल के कुछ और उल्लेखनीय गीतों में लाहौर का 'ओ रे बंदे', ब्रेक के बाद का 'धूप के मकान', मिर्च का 'कारे बदरा', दस तोला का 'जिया जलाइयो रे', लम्हा का 'मदनो', और लफ़ंगे परिंदे का 'मन लफ़ंगा' ज़िक्र के योग्य है.कुल मिलाकर फ़िल्म संगीत को अलग से पैकेज करने के बजाय निर्माताओं की रुचि फ़िल्म के प्रसार प्रचार के उपयोग के लिये ही नज़र आई.
इस बार फिर से डिजिटल संगीत का बोलबाला रहा हालांकि एक अच्छी बात ये हुई कि काफ़ी समय बाद फ़िल्म संगीत के एल पी रिकार्ड्स (झूठा ही सही) जारी करने का चलन फिर से शुरु हुआ.कुछ प्रमुख म्यूज़िक कंपनियों ने अपना संगीत डिजिटल फ़ॉर्म में इंटरनेट के ज़रिए पहली बार वैधानिक तरीके से डाउनलोड और ख़रीदने के लिये उपलब्ध कराया.
इस साल संगीतकार और गज़ब के सैक्सोफ़ोन वादक मनोहारी सिंह, युवा गायिका स्वर्णलता और विंटेज दौर की ललिता देओलकर जैसे बड़े नाम हमें हमेशा के लिये अलविदा कह गए.
इंडियन ओशन बैंड के अशीम चक्रवर्ती पिछले साल के आख़िर में इसी समय अलविदा कह गए थे. उनका ज़िक़्र इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इस साल इंडियन ओशन के संगीत के सफ़र पर बनी डॉक्यूमेंट्री, सिनेमा फ़ेस्टिवल्स और सैटेलाइट नेटवर्क के अतिरिक्त पहली बार सिनेमाघरों में नियमित शो पर दिखाई गई.
नए साल की शुरुआत से ही भारतीय संगीत प्रेमियों को उत्सुक्ता रहेगी कि क्या ए आर रहमान एक बार फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल होकर एक और बार ये पुरस्कार जीत पाएंगे.रहमान के संगीत वाली डैनी बॉयल की फ़िल्म 127 ऑवर्स का एक गीत दौड़ में शामिल है और जनवरी में ये साफ़ हो जाएगा कि सर्वश्रेष्ठ पाँच गीतों के लिए वो दौड़ में बना रहता है या नहीं. उम्मीद है कि 2011 में हिंदी फ़िल्म संगीत नए स्वर और नए रंग लेकर आएगा.
2010: सारांश
लोकप्रिय एलबम: दबंग, तीसमार ख़ां.
सर्वश्रेष्ठ एलबम : इश्क़िया, उड़ान, आएशा.
सर्वश्रेष्ठ संगीतकार : अमित त्रिवेदी
सर्वश्रेठ नवोदित स्वर : विभावरी जोशी (साइबा, फ़िल्म- ग़ुज़ारिश).
सर्वश्रेष्ठ गीत : दिल तो बच्चा है जी (गुलज़ार).
लोकप्रिय गीत : मुन्नी बदनाम हुई (दबंग), शीला की जवानी (तीसमार ख़ां), ज़ोर का झटका(ऐक्शन रीप्ले).
प्रयोगवादी संगीत : एल एस डी (लव सैक्स और धोखा)
निराशाजनक : वी आर फ़ैमिली, आशाएं, रोबोट.
2011: उम्मीदें
नो वन किल्ड जैसिका (अमित त्रिवेदी)
सात ख़ून माफ़ (विशाल भारद्वाज)
ये साली ज़िंदगी (निशात खान)
मौसम (प्रीतम)
रा.वन (इल्लैयाराजा, हैन्स ज़िम्मेर, विशाल-शेखर)
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