बनते-बिगड़ते सामरिक समीकरण, यूरोप में मची आर्थिक उथल पुथल, भारत- चीन जैसी नई उभरती महाशक्तियाँ, कोरिया में युद्ध के मंडारते बादल,अमरीकी दामन से निकलकर नई दिशा में बढ़ते इराक़ के हिचकिचाते क़दम, दुनिया को आँख दिखाता ईरान, चरमपंथ से जूझता अफ़ग़ानिस्तान...कुछ ऐसा रहा 2010 में विश्व का घटनाचक्र. एक बात जो पूरे घटनाचक्र में समान रही वो है विश्व में उलट पुलट होता सत्ता सुंतलन.
विकीलीक्स के घटनाचक्र ने साल का अंत-अंत होते पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया...ये वार न किसी हथियार का था, न परमाणु बम का न किसी मिसाइल का. ये घात लगाया इंटरनेट और तकनीक ने और इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा अमरीका जैसे उस देश को जहाँ इंटरनेट को उसकी ताक़त समझा जाता है.
विकीलीक्स
* ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के क़ैदियों को दूसरे देशों के यहाँ रखवाने के लिए अमरीका का मोलभाव
* संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व की जासूसी का हिलेरी क्लिंटन का आदेश
* रूस सरकार और माफ़िया में साँठगाँठ
* मुशर्रफ़-मनमोहन थे समझौते के करीब
* हिलेरी ने भारत की खिल्ली उड़ाई, कहा भारत ने सुरक्षा परिषद सदस्या की दौड़ में अपने आप को आगे कऱार दिया
* इराक़ी लोगों के साथ इराक़ी सैनिकों ने किया दुर्व्यवहार, अमरीका को थी जानकारी पर किया अनदेखा
* सऊदी अरब अमरीका को उकसाता रहा है कि वो ईरान पर हमला करे
* अमरीका की चिंता कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार चरमपंथियों के हाथ न लग जाएँ
विकीलीक्स ने लाखों संवेदनशील कूटनयिक संदेश दस्तावेज़ों के रूप में प्रकाशित किए जिसमें अमरीका से लेकर पाकिस्तान और सऊदी अरब समेत कई देशों को लपेटे में लिया है....विभिन्न देशों की कूटनीतिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मिसाल के तौर पर पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए अमरीका की सार्वजनिक वाहवाही को लीजिए,तो दूसरी ओर विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में इन देशों को लेकर अमरीका की गंभीर चिंताएँ और आशंकाएँ सामने आती हैं... विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में ये विरोधाभास झलकता है.
जैसे यूँ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका पाकिस्तान का साथ देता रहा है पर ये दस्तावेज़ दोनों के तनावपूर्ण रिश्तों को दर्शाते हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक अमरीका बेहद चिंतित है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार चरमपंथियों के हाथ न लग जाएँ, ये भी कहा गया है कि पाक अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान चरमपंथियों को सहयोग देता रहा है. विभिन्न देशों से जुड़े ऐसे ही कई दस्तावेज़ अब तक सामने आ चुके हैं.
चरमपंथ पर भारत का समर्थन करने के अमरीकी दावों पर भी विकीलीक्स ने सवाल उठाए हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक 26/11 के बाद अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने ख़ुद को भारत से अलग रखने का फ़ैसला किया था. इतना ही नहीं सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी की अमरीका ने खिल्ली उड़ाई है जबकि अमरीका ख़ुद को भारत का सहयोगी करार देता है और नवंबर में ही ओबामा भारत के हाईप्रोफ़ाइल दौरे पर आए थे.
पाकिस्तान और अमरीका ने विकीलीक्स के क़दम की कड़ी निंदा की है.इन दस्तावेज़ों को लेकर कई देशों की झुंझलाहट कनाडा के प्रधानमंत्री के सलाहकार के बयान से साफ़ झलकती है. उन्होंने टीवी पर ये तक कह डाला कि विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की हत्या कर देनी चाहिए.
दस्तावेज़ लीक करने का विकीलीक्स का क़दम कितना सही और कितना ग़लत है इस पर बहस जारी है. लेकिन एक बात तो तय है कि इस पूरे किस्से से अमरीका काफ़ी विचलित हुआ है और इसने कूटनीति और पत्रकारिता के मायने बदल दिए हैं.
विकीलीक्स पर ऑस्ट्रेलिया के बयान के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है. ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि दस्तावेज़ लीक होने के लिए ऑस्ट्रेलियाई संस्थापक जूलियन असांज नहीं बल्कि अमरीका ज़िम्मेदार है और ये अमरीकी सुरक्षा प्रबंधों पर सवाल खड़े करता है.
बलात्कार के आरोप में जूलियन असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार भी किया गया जिसे कुछ लोग बदले की कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं.
(अमरीका में अंदरूनी तौर पर भी हलचल रही. मध्यावधि चुनाव में सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को करारी हार मिली तो रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया. ओबामा ने माना कि अर्थव्यवस्था पर लोग नाराज़ हैं. ऐसे में अब ओबामा प्रशासन को कई विधेयकों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर चलना होगा.)
अमरीका के लिए सिरदर्द बने विकीलीक्स में इराक़ से जुड़े दस्तावेज़ों का भी ज़िक्र है. इराक़ के संदर्भ में 2010 को बयां करना हो तो नूरी अल मलिकी का बयान याद आता है जहाँ उन्होंने कहा है कि 2010 में इराक़ ‘आज़ाद’ हो गया. वो इसलिए क्योंकि अगस्त 2010 में अमरीका ने इराक़ में अपना सैन्य मिशन अंतत ख़त्म कर दिया.
इराक़ी सुरक्षाबलों को सलाह और प्रशिक्षण देने, विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने और अमरीकी हितों की रक्षा के लिए लगभग 50 हज़ार अमरीकी सैनिक इराक़ में बने रहेंगे. लेकिन विशेष हालातों को छोड़कर अमरीकी सैनिक सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेंगे.
इराक़ से जुड़े तथ्य
* जुलाई 2010 तक 97461 से एक लाख से ज़्यादा की संख्या के बीच नागरिकों की मौत (स्रोत इराक़ बॉडी काउंट)
* वर्ष 2003 में अमरीकी अभियान शुरु होने के बाद से चार हज़ार से ज़्यादा अमरीकी इराक़ में मारे गए (स्रोत : अमरीका रक्षा मंत्रालय
* 2011 के अंत तक अमरीका इराक़ युद्ध के ख़र्च पर करीब 802 अरब डॉलर ख़र्च कर चुका होगा. (स्रोत कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस) जबकि कुछ विशेषज्ञ ये की़मत तीन ट्रिलियन डॉलर बताते हैं.
बहुत से लोग आज भी इराक़ में अमरीकी अभियान को भयानक भूल मानते हैं जिस वजह से दुनिया भर में अमरीका की साख तार-तार हुई.
बड़ा सवाल ये है कि मार्च 2003 को शुरु हुए अमरीकी अभियान के बाद अब अमरीका कैसा इराक़ छोड़ कर जा रहा है? अंदरूनी हिंसा और राजनीतिक अस्थितरता से पार पा पाएगा इराक़?
विभिन्न संस्थाएँ दावा करती हैं कि साढ़े सात सालों में एक लाख से ज़्यादा लोगों की जान गई. कई बार इराक़ी क़ैदियों के साथ प्रताड़ना तो कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.
राजनीतिक तौर पर भी इराक़ को लोग किसी परिपक्व देश के तौर पर नहीं देख रहे. इराक़ में राजनीतिक गतिरोध का आलम ये रहा कि मार्च में हुए संसदीय चुनाव के बाद दिसंबर अंत में जाकर नई सरकार का गठन हो पाया और शिया नेता नूरी अल मलिकी दोबारा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए. जिसके बाद उम्मीद की एक छोटी सी किरण जगी है.
नौ अप्रैल 2003 को बग़दाद में सद्दाम हुसैन की मूर्ति तोड़ते अमरीकी सैनिकों की तस्वीर आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है लेकिन यही तस्वीर ये सवाल भी पूछती है कि अमरीकी अभियान ने आख़िर क्या हासिल किया...क्या इराक़ में अमन शांति है, बेहतर सुविधाएँ हैं, राजनीतिक स्थिरता है?
विकीलीक्स के घटनाचक्र ने साल का अंत-अंत होते पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया...ये वार न किसी हथियार का था, न परमाणु बम का न किसी मिसाइल का. ये घात लगाया इंटरनेट और तकनीक ने और इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा अमरीका जैसे उस देश को जहाँ इंटरनेट को उसकी ताक़त समझा जाता है.
विकीलीक्स
* ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के क़ैदियों को दूसरे देशों के यहाँ रखवाने के लिए अमरीका का मोलभाव
* संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व की जासूसी का हिलेरी क्लिंटन का आदेश
* रूस सरकार और माफ़िया में साँठगाँठ
* मुशर्रफ़-मनमोहन थे समझौते के करीब
* हिलेरी ने भारत की खिल्ली उड़ाई, कहा भारत ने सुरक्षा परिषद सदस्या की दौड़ में अपने आप को आगे कऱार दिया
* इराक़ी लोगों के साथ इराक़ी सैनिकों ने किया दुर्व्यवहार, अमरीका को थी जानकारी पर किया अनदेखा
* सऊदी अरब अमरीका को उकसाता रहा है कि वो ईरान पर हमला करे
* अमरीका की चिंता कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार चरमपंथियों के हाथ न लग जाएँ
विकीलीक्स ने लाखों संवेदनशील कूटनयिक संदेश दस्तावेज़ों के रूप में प्रकाशित किए जिसमें अमरीका से लेकर पाकिस्तान और सऊदी अरब समेत कई देशों को लपेटे में लिया है....विभिन्न देशों की कूटनीतिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मिसाल के तौर पर पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए अमरीका की सार्वजनिक वाहवाही को लीजिए,तो दूसरी ओर विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में इन देशों को लेकर अमरीका की गंभीर चिंताएँ और आशंकाएँ सामने आती हैं... विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में ये विरोधाभास झलकता है.
जैसे यूँ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका पाकिस्तान का साथ देता रहा है पर ये दस्तावेज़ दोनों के तनावपूर्ण रिश्तों को दर्शाते हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक अमरीका बेहद चिंतित है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार चरमपंथियों के हाथ न लग जाएँ, ये भी कहा गया है कि पाक अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान चरमपंथियों को सहयोग देता रहा है. विभिन्न देशों से जुड़े ऐसे ही कई दस्तावेज़ अब तक सामने आ चुके हैं.
चरमपंथ पर भारत का समर्थन करने के अमरीकी दावों पर भी विकीलीक्स ने सवाल उठाए हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक 26/11 के बाद अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने ख़ुद को भारत से अलग रखने का फ़ैसला किया था. इतना ही नहीं सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी की अमरीका ने खिल्ली उड़ाई है जबकि अमरीका ख़ुद को भारत का सहयोगी करार देता है और नवंबर में ही ओबामा भारत के हाईप्रोफ़ाइल दौरे पर आए थे.
पाकिस्तान और अमरीका ने विकीलीक्स के क़दम की कड़ी निंदा की है.इन दस्तावेज़ों को लेकर कई देशों की झुंझलाहट कनाडा के प्रधानमंत्री के सलाहकार के बयान से साफ़ झलकती है. उन्होंने टीवी पर ये तक कह डाला कि विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की हत्या कर देनी चाहिए.
दस्तावेज़ लीक करने का विकीलीक्स का क़दम कितना सही और कितना ग़लत है इस पर बहस जारी है. लेकिन एक बात तो तय है कि इस पूरे किस्से से अमरीका काफ़ी विचलित हुआ है और इसने कूटनीति और पत्रकारिता के मायने बदल दिए हैं.
विकीलीक्स पर ऑस्ट्रेलिया के बयान के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है. ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि दस्तावेज़ लीक होने के लिए ऑस्ट्रेलियाई संस्थापक जूलियन असांज नहीं बल्कि अमरीका ज़िम्मेदार है और ये अमरीकी सुरक्षा प्रबंधों पर सवाल खड़े करता है.
बलात्कार के आरोप में जूलियन असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार भी किया गया जिसे कुछ लोग बदले की कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं.
(अमरीका में अंदरूनी तौर पर भी हलचल रही. मध्यावधि चुनाव में सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को करारी हार मिली तो रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया. ओबामा ने माना कि अर्थव्यवस्था पर लोग नाराज़ हैं. ऐसे में अब ओबामा प्रशासन को कई विधेयकों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर चलना होगा.)
अमरीका के लिए सिरदर्द बने विकीलीक्स में इराक़ से जुड़े दस्तावेज़ों का भी ज़िक्र है. इराक़ के संदर्भ में 2010 को बयां करना हो तो नूरी अल मलिकी का बयान याद आता है जहाँ उन्होंने कहा है कि 2010 में इराक़ ‘आज़ाद’ हो गया. वो इसलिए क्योंकि अगस्त 2010 में अमरीका ने इराक़ में अपना सैन्य मिशन अंतत ख़त्म कर दिया.
इराक़ी सुरक्षाबलों को सलाह और प्रशिक्षण देने, विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने और अमरीकी हितों की रक्षा के लिए लगभग 50 हज़ार अमरीकी सैनिक इराक़ में बने रहेंगे. लेकिन विशेष हालातों को छोड़कर अमरीकी सैनिक सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेंगे.
इराक़ से जुड़े तथ्य
* जुलाई 2010 तक 97461 से एक लाख से ज़्यादा की संख्या के बीच नागरिकों की मौत (स्रोत इराक़ बॉडी काउंट)
* वर्ष 2003 में अमरीकी अभियान शुरु होने के बाद से चार हज़ार से ज़्यादा अमरीकी इराक़ में मारे गए (स्रोत : अमरीका रक्षा मंत्रालय
* 2011 के अंत तक अमरीका इराक़ युद्ध के ख़र्च पर करीब 802 अरब डॉलर ख़र्च कर चुका होगा. (स्रोत कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस) जबकि कुछ विशेषज्ञ ये की़मत तीन ट्रिलियन डॉलर बताते हैं.
बहुत से लोग आज भी इराक़ में अमरीकी अभियान को भयानक भूल मानते हैं जिस वजह से दुनिया भर में अमरीका की साख तार-तार हुई.
बड़ा सवाल ये है कि मार्च 2003 को शुरु हुए अमरीकी अभियान के बाद अब अमरीका कैसा इराक़ छोड़ कर जा रहा है? अंदरूनी हिंसा और राजनीतिक अस्थितरता से पार पा पाएगा इराक़?
विभिन्न संस्थाएँ दावा करती हैं कि साढ़े सात सालों में एक लाख से ज़्यादा लोगों की जान गई. कई बार इराक़ी क़ैदियों के साथ प्रताड़ना तो कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.
राजनीतिक तौर पर भी इराक़ को लोग किसी परिपक्व देश के तौर पर नहीं देख रहे. इराक़ में राजनीतिक गतिरोध का आलम ये रहा कि मार्च में हुए संसदीय चुनाव के बाद दिसंबर अंत में जाकर नई सरकार का गठन हो पाया और शिया नेता नूरी अल मलिकी दोबारा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए. जिसके बाद उम्मीद की एक छोटी सी किरण जगी है.
नौ अप्रैल 2003 को बग़दाद में सद्दाम हुसैन की मूर्ति तोड़ते अमरीकी सैनिकों की तस्वीर आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है लेकिन यही तस्वीर ये सवाल भी पूछती है कि अमरीकी अभियान ने आख़िर क्या हासिल किया...क्या इराक़ में अमन शांति है, बेहतर सुविधाएँ हैं, राजनीतिक स्थिरता है?
0 comments:
Post a Comment