आर्थिक मंदी से उभरने की कोशिश करते विश्व को 2010 में कई नई वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ा.एक तरफ़ अमरीका ने अपनी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए अरबों डॉलर का पैकेज दिया तो दूसरी तरफ़ यूरोपीय संघ के कुछ देशों में ऋण संकट गहराता गया.
राष्ट्रपति ओबामा का पैकेज अमरीकी अर्थव्यस्था पर वांछित असर डाल पाएगा या नहीं ये तो आने वाले वित्तीय वर्ष में ही पता चल पाएगा लेकिन यूरो क्षेत्र में स्थिति बेहद गंभीर दिखती है.ऋण संकट से जूझते यूरोप और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयास करते अमरीका के बीच चीन और भारत के विकास की रफ़्तार बरक़रार रही.
नवंबर में दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्राध्यक्ष विश्व आर्थिक मंदी से निपटने के लिए उपाय खोजने के मक़सद से सिओल में जमा हुए.सम्मेलन में आर्थिक संकट पर तो ख़ूब चर्चा हुई लेकिन अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक असंतुलन और मुद्रा विनिमयन का मुद्दा भी छाया रहा.ग़ौरतलब है कि चीन और अमरीका में चीनी मुद्रा यूआन के मूल्यांकन को लेकर भारी मतभेद हैं. साथ ही अमरीका चीन के 'ट्रेड सरप्लस' से भी ख़ुश नहीं है.अमरीका का मत रहा है कि चीन जानबूझ कर अपनी मुद्रा को कमज़ोर रखता है ताकि उसे निर्यात में फ़ायदा हो. चीन इन आरोपों से इनकार करता रहा है.
भारत ने 2010 में भी दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में छाई निराशा के बावजूद एक स्वस्थ विकास दर को बरक़रार रखा.साढ़े आठ प्रतिशत से भी अधिक की विकास दर ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगले वित्तीय वर्ष के लिए नौ प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रखने के लिए त्साहित किया.जानकार मानते हैं कि नौ प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य पाना काफ़ी हद तक संभव है.इस तर्क को ताज़ा आंकड़ों से भी बल मिलता है. देश के औद्योगिक उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.इसका अर्थ है कि उपभोक्ताओं की ख़रीद क्षमता पिछले वर्ष के मुक़ाबले बेहतर हुई है.
बीबीसी विश्व सेवा के आर्थिक मामलों के संवाददाता एंड्रयू वॉकर मानते हैं कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर सामान्य सी है और उनमें अधिकतर को अब भी एक और आर्थिक मंदी का डर सता रहा है.इसके विपरीत विकासशील देशों में विकास दर स्थानीय कंपनियों के उत्पादन के लिए उपभोक्ता मांग के चलते काफ़ी मज़बूत है.मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत की विकास दर चीन के बाद दूसरी सबसे तेज़ विकास दर होने की ओर अग्रसर है.मंदी से उबरने के लिए जूझ रही यूरोपीय और अमरीकी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ये एक बड़ी उपलब्धि है.
इसी बीच भारत में 2010 में ये बहस भी तेज़ होती गई कि कहीं इस उच्च विकास दर की वजह मुद्रास्फीति की दर में हुई बढ़ोत्तरी तो नहीं है.
मुद्रास्फीति की दर 2010
महीना थोकमूल्य उपभोक्तामूल्य
जनवरी 8.53 16.32
फ़रवरी 9.68 14.86
मार्च 10.23 14.86
अप्रैल 11.00 13.33
मई 10.60 13.91
जून 10.28 13.73
जुलाई 10.02 11.25
अगस्त 8.82 9.88
सितंबर 8.62 9.82
अक्तूबर 8.58 -
सभी आंकड़ें प्रतिशत में
*स्रोत: वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
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