यूरोज़ोन संकट में

Saturday, February 5, 2011

आयरलैंड की आर्थिक स्थिति डांवाडोल

चीन जहाँ आर्थिक प्रगति की राह पर अग्रसर है वहीं आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश में लगे विश्व को 2010 में यूरोप ने झटका दिया. मज़बूत माने जाने वाले कई यूरोपीय देश धराशायी हो गए जिसका राजनीतिक असर भी देखने को मिला.

ग्रीस में मई 2010 की एक घटना यूरोप के आर्थिक संकट की गंभीरता को दर्शाता है. ग्रीस में आर्थिक कटौतियों के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में नाराज़ नागरिकों ने एक बैंक की इमारत को आग लगा थी और अंदर तीन कर्मचारियों की मौत हो गई जिसमें एक गर्भवती महिला भी थीं.

संकट से घिरे सब देशों की स्क्रिप्ट एक जैसी ही थी- देशों पर कर्ज़ का बोझ, आर्थिक कटौतियाँ, विरोध प्रदर्शन और फिर संकट से जूझने के लिए बाहरी मदद का सहारा.

ब्रिटेन में शुल्क में बढ़ोत्तरी का विरोध करते छात्र

शुरु करते हैं ब्रिटेन से जहाँ 2010 में चुनाव हुआ और 70 सालों की पहली बार मिली-जुली सरकार बनी. नई सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की राह में बड़े पैमाने पर कटौतियाँ घोषित की.

लंदन की सड़कों पर दशकों बाद विरोध के दृश्य देखने को मिले जब हज़ारों छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर आए. ये लोग इंग्लैंड की यूनिवर्सिटियों के शिक्षण शुल्क में तीन गुना तक की वृद्धि का विरोध कर रहे थे.
आर्थिक संकट

    * रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड को यूरोपीय संघ और आईएमएफ़ से लेनी पड़ी मदद
    * ग्रीस को की मदद
    * ब्रिटेन में बड़े स्तर पर बजट में कटौती, लोगों का विरोध प्रदर्शन
    * यूरोप के कई बड़े देश कर्ज़ के बोझ तले दबे
    * इटली का कुल कर्ज़ उसकी जीडीपी का 115.8 फ़ीसदी, ग्रीस का कुल कर्ज़ 115.1 फ़ीसदी ( आँकड़े 2009 के)

वहीं रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड की सरकार को अपना आर्थिक संकट सुलझाने के लिए अंतत यूरोपीय संघ की शरण में जाना पड़ा. अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ आयरलैंड को तीन साल के भीतर करीब 100 अरब डॉलर देंगे.

लेकिन आयरलैंड को इसके बदले में कई कटौतियों की घोषणा करनी पड़ीं. कटौतियों के ख़िलाफ़ ब्रिटेन की तरह यहाँ भी विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार को इसका राजीतिक ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ा और प्रधानमंत्री ब्रायन कावेन को घोषणा करनी पड़ी कि यूरोपीय संघ से मिलने वाली आर्थिक मदद की रूपरेखा तय होने के बाद वे नए साल में चुनाव करवाएँगे.

ग्रीस भी 2010 में आर्थिक संकट से जूझता रहा. अप्रैल में हालात ये थे कि ग्रीस पर लगभग 300 अरब यूरो का कर्ज़ था. नतीजतन बड़े स्तर पर कटौतियाँ. आख़िरकर यूरोपीय यूनियन 145 अरब डॉलर के कर्ज़ को मंज़ूरी दे दी थी

ग्रीस के संकट के कारण यूरोप ही नहीं दुनिया भर के बाज़ारों में गिरावट का दौर रहा. यूरोपीय संघ में इसे लेकर अफ़रा-तफ़री का माहौल रहा कि कहीं ग्रीस का संकट बाकी देशों को अपनी चपेट में न ले ले.

ग्रीस के अलावा स्पेन में भी आर्थिक हलचल चल रही है.या कहें कि यूरोज़ोन के कई देशों के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं है और यूरो के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं.

दुनिया के मज़बूत आर्थिक स्तंभ माने जाने वाले- अमरीका, यूरोप और जापान की स्थिति ख़राब है. जबकि भारत-चीन की विकास दर अच्छी चल रही है.

पर आशंका यही है कि वैश्विकरण के दौर में जब एक देश की आर्थिक डोर दूसरे से बंधी हुई है, ऐसे में एक देश में मचा आर्थिक कोहराम आसानी से अन्य देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.
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