चीन का प्रभुत्व

Saturday, February 5, 2011

बात चाहे ईरान मसले की हो, उत्तर कोरिया की या वैश्विक अर्थव्यवस्था की.. 2010 का पूरा घटनाक्रम कहीं न कहीं विश्व में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को दर्शाता है.

कोरियाई प्रायद्वीप में संकट के बादल छाए तो सबकी नज़रें चीन पर थीं. अमरीकी सेना प्रमुख माइक मलेन ने भी माना है कि उत्तर कोरिया पर चीन का ‘अलग’ प्रभाव है जिसका इस्तेमाल चीन को उ. कोरिया पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए.
चीन का दबदबा

    * चीन घातक,आक्रमक और नैतिक प्रतियोगी- अमरीका
    * चीन विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक
    * चीन है विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति
    * चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध को रोका-विकीलीक्स

चीन के बढ़ते असर का एक नमूना विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में भी नज़र आता है. जिनमें कहा गया है कि मुंबई में 26/11 हमलों से पहले पाकिस्तान के कहने पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध को रोक लिया था. ये तब जब अमरीका प्रतिबंध के पक्ष में था.

विकीलीक्स से निकले दस्तावेज़ों में चीन से अमरीका की आशंका साफ़ झलकती है जहाँ राजनयिकों ने साफ़ तौर पर कहा है कि 'चीन बहुत ही आक्रमक और ख़तरनाक आर्थिक प्रतियोगी' है.

विकीलीक्स की मानें तो गूगल पर जनवरी में हुए साइबर हमले चीन ने ही करवाए थे क्योंकि गूगल पर चीनी अधिकारियों की आलोचना वाले लेख थे.

चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने 2010 में भारत का हाई प्रोफ़ाइल दौरा भी किया.

कूटनीतिक और सामरिक मामलों में ही नहीं, आर्थिक मामलों में भी दुनिया में चीन का दबदबा है. एक ओर जहाँ विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रही हैं, वहीं आर्थिक मंदी का बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है.

2010 में तो चीन जर्मनी को पछाड़ विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया. चीनी मुद्रा की कम विनिमय दर की अमरीका कड़ी आलोचना कर चुका है. आईएमएफ़ ने तो युआन को लेकर मुद्रा युद्ध तक की बात कह डाली है.

चीनी कार्यकर्ता लू श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने को लेकर भी चीन दवाब बनाता रहा कि कई देश इस कार्यक्रम का बहिष्कार करें और कई देशों ने ऐसा किया भी.

टीकाकारों की राय में तमाम मुद्दों पर चीन से मतभेदों के बावजूद अमरीका समेत किसी भी देश के लिए चीन से सीधे टकराव लेना अब उतना आसान नहीं रहा.
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